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खाटू धाम की माटी म्हारै रास आ गई (Lyrics-नरसी जी)

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सुप्रसिद्ध भजन: कण - कण में तेरा वास प्रभु। जो करे दुखों का नाश प्रभु। दुनिया भर की खुशियां मेरे पास आ गई। थारे धाम की माटी म्हारै रास आ गई। कोई नहीं दिख्यो अपणो, जद तू ही नजर मनै आयो। खाटू नगरी आ बैठयो, जब मेरो जी घबरायो। पैर धरयो खाटू मैं, सांस मै सांस आ गई। खाटू धाम की माटी.... खाटू की माटी का, हमने देखा अजब नजारा। क्या निर्धन क्या सेठ, सभी को इसने पार उतारा। दुनिया सारी करके, ये विश्वास आ गई। थारे धाम की माटी.... रेत नहीं मामूली, ये तो है संजीवन बूटी। मौज करूं दिन साँवरा, सोऊं तान के खूंटी। होली और दीवाली, बारहों मास आ गई। खाटू धाम की माटी.... तेरी इस पावन मिट्टी में, मैं मिट्टी हो जाऊँ। सदा - सदा के लिए, तेरे इन चरणों में सो जाऊँ। "नरसी" के होंठो पे, इतनी प्यास आ गई। खाटू धाम की माटी.... लेखक एवं गायक: श्री नरेश "नरसी" जी। फतेहाबाद - हरियाणा। मोबाइल: 94-162-41-061 🙏🙏🙏🙏🙏 भजन प्रेषक : प्रदीप सिंघल (जीन्द वाले)

The Story of Middle Class People

मैंने अब तक यही महसूस किया कि हम मध्य वर्गीय लोगों का ज्यादातर जीवन उम्मीद के सहारे बीत जाता है मुझे याद है जब मैंने सन् 1998 में दिल्ली से दसवीं की बोर्ड परीक्षा पास कि तो, नंबर कुछ खास ना आ पाने की वजह से परिवार वालों को यही लगा कि ये अब पढ़ाई में नहीं चल सकता। अच्छा होगा कि कोई काम काज ही करवा दें। लगभग उस समय मेरी आयु लगभग 18 वर्ष की होगी, यूं तो व्यापारी परिवार से हूँ जिस कारण हमारे यहाँ नौकरी से ज्यादा अपने काम को ही महत्त्व दिया जाता है। बेशक से व्यापार छोटा ही किया जाये पर व्यापार करने के लिए ही प्रेरित किया जाता है। सपने तो हम लोगों के बहुत बड़े बड़े होते हैं लेकिन हमें उन्हें पूरा करने का हक नहीं होता क्योंकि परिवार के पास इतनी क्षमता ही नहीं होती कि बच्चों के भविष्य पर ध्यान दिया जाए। बस किसी तरह आज गुजर जाये कल जो होगा देखा जायेगा। दिन बीतते साइकिल से शुरू हुआ जीवन साइकिल के पहिये की तरह घूमता रहा।                            To be continued....

मुझे याद आई छुट्टियाँ वो गर्मी की👇

सन् 1997 में स्कूल समय के दौरान आखिरी बार गर्मियों की छुट्टियाँ मिली। उसके बाद गर्मी तो निरंतर पड़ी, गर्मी को सहन करने की स्वयं की क्षमता भी घटी। लेकिन लगभग 23 वर्षों के लंबे अंतराल में गर्मियों की छुट्टियां कभी नहीं पड़ी। 2020 कोरोना काल ने ऐसा मौका दिया कि 20 मार्च से 26 मई तक छुट्टियाँ ही चल रही हैं। देखते हैं छुट्टियां 31 मई के बाद भी बढ़ती हैं या फिर ये छुट्टियों का सिलसिला यहीं खत्म हो जायेगा। ✍🏻"प्रदीप सिंघल"

अमीर पिता और गरीब पिता के बच्चों में फर्क 👇

अमीर पिता के बच्चों को धन-दौलत, ऐशो-आराम, मौज-मस्ती ये सब विरासत में मिलती है। गरीब पिता के बच्चों को गरीबी, बदहाली, बेबसी, लाचारी विरासत में मिलती है,उन्हें इससे लड़ने के लिए तमाम उम्र कड़ी मेहनत और लंबा संघर्ष करना पड़ता है। ✍🏻 प्रदीप सिंघल।

कहानी सिंघल की

मेरे एक सहपाठी मित्र की पिछले दिनों मुझ पर नजर पड़ गई। मुझे देखते ही बोले तुम तो शायद प्रदीप हो मैंने कहा हां, लेकिन आप मुझे कैसे जानते हैं। बोले याद करो 1995 से 1998 का वो सरकारी स्कूल का समय, जब तुम ऐसी एक पुरानी सी एक साइकिल पर स्कूल आया करते थे जिसकी सीट पर सीट कवर की जगह कपड़ा बंधा हुआ करता था। मैंने कहां कुछ-कुछ ध्यान आया और तुम उस समय शायद गाड़ी से स्कूल आया करते थे। बोले हां - हां। कहने लगे प्रदीप भाई तुम उस समय पैड़ल वाली साइकिल पर थे और आज दो पहियों की मोटर वाली साइकिल पर हो क्या बात इतने सालों में कुछ तरक्की-वरक्की नहीं की। मैंने कहा मेरी छोड़ो लेकिन सच कहूं तो तुम्हें इस लंबी सी कई लाख वाली गाड़ी में देखकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। तो कहने लगे प्रदीप भाई तुम्हारा एक एहसान है मुझ पर, मैंने कहा मुझ गरीब का क्या एहसान हो सकता है तुम जैसे धनी व्यक्ति पर। बोले बोर्ड की दसवीं कक्षा के दौरान जब आखिरी पेपर के दौरान मेरा पैन बीच में ही खत्म हो गया था, तो तुमने अपने दो पैनों में से मुझे अपना एक पैन दिया था। जिससे मैंने अपना पेपर पूरा किया और अच्छे खासे नंबरों से पास हुआ। उसके बाद स्कू...

कवि महोदय फौजी तहलान जसौर खेड़ी की कलम से 👇

आज सोलह फोटो देखे हैं मैंने,जो कलेजा चीर रहे हैं।  हर फोटो में दर्द छलक रहा,भर आंखों में नीर रहे हैं।  बांध के रस्सी बैग से देखो,बच्चे की माँ खींचे जा रही।  और पीछे से इसकी औलाद,बैग को धक्का लगा रही।  कंधे पर बेटे को बैठा लिया,क्यूंकि बाहों में सामान है।  चल पड़ा गाँव की डगर,मजबूर बड़ा आज इंसान है।  5 साल का नन्हा बच्चा,जो होना चाहिए था गोदी में।  वह भी पैदल चल रहा है,आज यारों सरकार मोदी में।  औरतों के सिर पर सामान,इनके दोनों पांव भी नंगे हैं।  हुक्मरान सारे AC में बैठे,क्यूंकि उनके हालात चंगे हैं।  शहरों ने बेघर किया है इनको,फुटपाथों पर रात कटी।  सब को हिलाके रख दिया,देश में गंभीर दुर्घटना घटी।  बाप जाग रहा बेटे सो रहे हैं,पार्क के किसी कोने में।  आंखें भी खाली हो गई हैं,आज दिन-रात के रोने में।  किसी ने कुछ नही किया तो,जिंदगी लगादी दाव पर।  देश में इतना मरहम नही,जो लग सके इनके घाव पर।  आंखों ने बरसना शुरू किया,जब घरवालों से बात हुई।  अरसा हो गया तुम्हें देखे,बड़े दिनों से ना मुला...

अहमियत पैसों की

पैसों की अहमियत समझना जरूरी, "सिंघल" इससे चलती है जीवन की गाड़ी। स ब कुछ बंद कहां से आएं पैसे, इसी फिक्र में चल रही है रूक - रूक के नाड़ी। ✍🏻 "प्रदीप सिंघल"