कवि महोदय फौजी तहलान जसौर खेड़ी की कलम से 👇
आज सोलह फोटो देखे हैं मैंने,जो कलेजा चीर रहे हैं।
हर फोटो में दर्द छलक रहा,भर आंखों में नीर रहे हैं।
बांध के रस्सी बैग से देखो,बच्चे की माँ खींचे जा रही।
और पीछे से इसकी औलाद,बैग को धक्का लगा रही।
कंधे पर बेटे को बैठा लिया,क्यूंकि बाहों में सामान है।
चल पड़ा गाँव की डगर,मजबूर बड़ा आज इंसान है।
5 साल का नन्हा बच्चा,जो होना चाहिए था गोदी में।
वह भी पैदल चल रहा है,आज यारों सरकार मोदी में।
औरतों के सिर पर सामान,इनके दोनों पांव भी नंगे हैं।
हुक्मरान सारे AC में बैठे,क्यूंकि उनके हालात चंगे हैं।
शहरों ने बेघर किया है इनको,फुटपाथों पर रात कटी।
सब को हिलाके रख दिया,देश में गंभीर दुर्घटना घटी।
बाप जाग रहा बेटे सो रहे हैं,पार्क के किसी कोने में।
आंखें भी खाली हो गई हैं,आज दिन-रात के रोने में।
किसी ने कुछ नही किया तो,जिंदगी लगादी दाव पर।
देश में इतना मरहम नही,जो लग सके इनके घाव पर।
आंखों ने बरसना शुरू किया,जब घरवालों से बात हुई।
अरसा हो गया तुम्हें देखे,बड़े दिनों से ना मुलाकात हुई।
बाप के कंधों पर सुबह हुई थी,कंधों पर ही शाम ढ़ली।
कई दिनों से भटक रहे ,सड़क-सड़क और गली-गली।
लंबी-लंबी लगी हैं कतारें,हर तरफ माहौल है क्लेस का।
यूँ मानों जैसे फिर से बटवारा,हो रहा हो अपने देश का।
जेठ की चिलचिलाती धूप में,ये अपने तन को जला रहे।
कौन रोटियां देगा पोकर,पानी पी-पी के काम चला रहे।
नन्हे कदम हैं और गर्म सड़क,इन्हें जाना गाँव जरूरी है।
अभी तो सफर शुरू हुआ है,तै करनी बहुत बड़ी दूरी है।
कभी बेटा माँ की गोद में था,आज बेटे की गोद में है माँ।
माँ को मुश्किल में छोड़के,क्या जा सकता है कोई कहां।
तकलीफों के पहाड़ खड़े हैं,आज चारों तरफ राहों में।
उससे बड़ा दर्द नही,औलाद की लाश हो जब बाहों में।
ट्रेले में तो बैठ लिए हैं,लेकिन आगे पुलिस का पहरा है।
यही सोचके तो इन बेचारों का,हर इक सांस ठहरा है।
उम्र बड़ी और सफर भी लंबा,चल-चलके घुटने टूट गए।
रूके नही ये बूढ़े कदम फिर भी,छाले हुए और फूट गए।
मैं जितना लिखूं उतना ही कम,इतना बेचारों को गम है।
इसके अश्क भी पोंछले,तहलान तेरी कलम भी नम है।
हर फोटो में दर्द छलक रहा,भर आंखों में नीर रहे हैं।
बांध के रस्सी बैग से देखो,बच्चे की माँ खींचे जा रही।
और पीछे से इसकी औलाद,बैग को धक्का लगा रही।
कंधे पर बेटे को बैठा लिया,क्यूंकि बाहों में सामान है।
चल पड़ा गाँव की डगर,मजबूर बड़ा आज इंसान है।
5 साल का नन्हा बच्चा,जो होना चाहिए था गोदी में।
वह भी पैदल चल रहा है,आज यारों सरकार मोदी में।
औरतों के सिर पर सामान,इनके दोनों पांव भी नंगे हैं।
हुक्मरान सारे AC में बैठे,क्यूंकि उनके हालात चंगे हैं।
शहरों ने बेघर किया है इनको,फुटपाथों पर रात कटी।
सब को हिलाके रख दिया,देश में गंभीर दुर्घटना घटी।
बाप जाग रहा बेटे सो रहे हैं,पार्क के किसी कोने में।
आंखें भी खाली हो गई हैं,आज दिन-रात के रोने में।
किसी ने कुछ नही किया तो,जिंदगी लगादी दाव पर।
देश में इतना मरहम नही,जो लग सके इनके घाव पर।
आंखों ने बरसना शुरू किया,जब घरवालों से बात हुई।
अरसा हो गया तुम्हें देखे,बड़े दिनों से ना मुलाकात हुई।
बाप के कंधों पर सुबह हुई थी,कंधों पर ही शाम ढ़ली।
कई दिनों से भटक रहे ,सड़क-सड़क और गली-गली।
लंबी-लंबी लगी हैं कतारें,हर तरफ माहौल है क्लेस का।
यूँ मानों जैसे फिर से बटवारा,हो रहा हो अपने देश का।
जेठ की चिलचिलाती धूप में,ये अपने तन को जला रहे।
कौन रोटियां देगा पोकर,पानी पी-पी के काम चला रहे।
नन्हे कदम हैं और गर्म सड़क,इन्हें जाना गाँव जरूरी है।
अभी तो सफर शुरू हुआ है,तै करनी बहुत बड़ी दूरी है।
कभी बेटा माँ की गोद में था,आज बेटे की गोद में है माँ।
माँ को मुश्किल में छोड़के,क्या जा सकता है कोई कहां।
तकलीफों के पहाड़ खड़े हैं,आज चारों तरफ राहों में।
उससे बड़ा दर्द नही,औलाद की लाश हो जब बाहों में।
ट्रेले में तो बैठ लिए हैं,लेकिन आगे पुलिस का पहरा है।
यही सोचके तो इन बेचारों का,हर इक सांस ठहरा है।
उम्र बड़ी और सफर भी लंबा,चल-चलके घुटने टूट गए।
रूके नही ये बूढ़े कदम फिर भी,छाले हुए और फूट गए।
मैं जितना लिखूं उतना ही कम,इतना बेचारों को गम है।
इसके अश्क भी पोंछले,तहलान तेरी कलम भी नम है।
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