कहानी सिंघल की
मेरे एक सहपाठी मित्र की पिछले दिनों मुझ पर नजर पड़ गई। मुझे देखते ही बोले तुम तो शायद प्रदीप हो मैंने कहा हां, लेकिन आप मुझे कैसे जानते हैं। बोले याद करो 1995 से 1998 का वो सरकारी स्कूल का समय, जब तुम ऐसी एक पुरानी सी एक साइकिल पर स्कूल आया करते थे जिसकी सीट पर सीट कवर की जगह कपड़ा बंधा हुआ करता था। मैंने कहां कुछ-कुछ ध्यान आया और तुम उस समय शायद गाड़ी से स्कूल आया करते थे। बोले हां - हां। कहने लगे प्रदीप भाई तुम उस समय पैड़ल वाली साइकिल पर थे और आज दो पहियों की मोटर वाली साइकिल पर हो क्या बात इतने सालों में कुछ तरक्की-वरक्की नहीं की। मैंने कहा मेरी छोड़ो लेकिन सच कहूं तो तुम्हें इस लंबी सी कई लाख वाली गाड़ी में देखकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। तो कहने लगे प्रदीप भाई तुम्हारा एक एहसान है मुझ पर, मैंने कहा मुझ गरीब का क्या एहसान हो सकता है तुम जैसे धनी व्यक्ति पर। बोले बोर्ड की दसवीं कक्षा के दौरान जब आखिरी पेपर के दौरान मेरा पैन बीच में ही खत्म हो गया था, तो तुमने अपने दो पैनों में से मुझे अपना एक पैन दिया था। जिससे मैंने अपना पेपर पूरा किया और अच्छे खासे नंबरों से पास हुआ। उसके बाद स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से नौकरी और नौकरी से व्यापार तरक्की मिलती गई और बात बनती गई। पैसा आता गया तो महंगी चीज़ सस्ती हो गई। लेकिन ये समझ नहीं आया कि प्रदीप भाई तुम्हें तरक्की क्यूं नहीं मिली। जबकि पढ़ने में होशियार, लिखने में भी साफ सुथरी लिखाई, हर विषय पर निबंध लिखने की कला, किसी बात को एक बार पढ़ लेने पर जल्दी से ना भूल पाना जैसे कि बात तुमने नहीं, तुम्हारे दिमाग ने पढ़ी हो। तो फिर कहां मार खा गये। मैंने कहा मेरे भाई सब कर्मों का खेल है। तो कहने लगे चलो छोड़ो इन बातों को लेकिन तुम्हारा जो एक एहसान है मैं उसके बदले मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ। मैंने कहा जिसे तुम एहसान समझ रहे वो तो एक साधारण सी मदद थी और मदद की कीमत वसूलना मेरी फिदरत नहीं। बोले फिर भी कोई काम हो तो बता देना, मैंने कहा अगर ऐसी ही बात है तो बस एक काम कर देना। जिस परमात्मा से अपने लिए रोज मांगते हो, उससे सिर्फ एक दिन अपनी प्रार्थना में मेरे लिए भी कुछ मांग लेना।
मेरे प्रिय दोस्तों मेरा कहना का तात्पर्य यही है कि इंसान चाहे कितना ही गुणी हो, कितना ही काबिल हो, कितना ही पढ़ा लिखा हो जब तक उस पर ऊपर वाले की सीधी नजर और अच्छे लोगों का साथ नहीं मिलता वो तरक्की नहीं कर पाता
✍🏻 प्रदीप सिंघल।
मेरे प्रिय दोस्तों मेरा कहना का तात्पर्य यही है कि इंसान चाहे कितना ही गुणी हो, कितना ही काबिल हो, कितना ही पढ़ा लिखा हो जब तक उस पर ऊपर वाले की सीधी नजर और अच्छे लोगों का साथ नहीं मिलता वो तरक्की नहीं कर पाता
✍🏻 प्रदीप सिंघल।
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