Online पढ़ाने का चक्कर:
ओन लाईन पढ़ाने का,चक्कर समझ नहीं आया।
सुबह से शाम तक सोचा,सोच के सर भी चकराया।
पब्लिक के सामने आ रही,अब नई ही सूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
यहां कुछ बनके व्यापारी,कर रहे शिक्षा का व्यापार।
खो गए शिक्षा के मंदिर,दुकानों का हुआ प्रचार।
सभी के बंद पड़े धंधे,फीस के भेज रहे मैसेज।
बताओ क्यूं तुम्हारे दिल,में इतना कदूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
प्रोब्लम सामने आई,किया नजरों को जब जूम।
किसी को समझ नहीं आता,कोई है फोन से महरूम।
नहीं हर बच्चा होशियार,कुछ कमजोर भी तो हैं।
उन्हें नहीं मिल रही उतनी,चाहिए जितनी नूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
कई दिनों से देख रहा,है "तहलान" ये हंगामा।
हो रहा है तरकीबों से,हिंदुस्तान में ये ड्रामा।
वक्त नहीं खुदगर्जी का ये,वक्त है पून्य कमाने का।
स्वार्थ भूल कर देखो,ये दुनिया खूबसूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
🙏🙏🙏🙏🙏
रचियता: फौजी तहलान जसौर खेड़ी।
मो० 8168845541,9017903739
स्वर: मिस्टर यश दलाल।
प्रेषक: प्रदीप सिंघल (जीन्द वाले)
सुबह से शाम तक सोचा,सोच के सर भी चकराया।
पब्लिक के सामने आ रही,अब नई ही सूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
यहां कुछ बनके व्यापारी,कर रहे शिक्षा का व्यापार।
खो गए शिक्षा के मंदिर,दुकानों का हुआ प्रचार।
सभी के बंद पड़े धंधे,फीस के भेज रहे मैसेज।
बताओ क्यूं तुम्हारे दिल,में इतना कदूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
प्रोब्लम सामने आई,किया नजरों को जब जूम।
किसी को समझ नहीं आता,कोई है फोन से महरूम।
नहीं हर बच्चा होशियार,कुछ कमजोर भी तो हैं।
उन्हें नहीं मिल रही उतनी,चाहिए जितनी नूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
कई दिनों से देख रहा,है "तहलान" ये हंगामा।
हो रहा है तरकीबों से,हिंदुस्तान में ये ड्रामा।
वक्त नहीं खुदगर्जी का ये,वक्त है पून्य कमाने का।
स्वार्थ भूल कर देखो,ये दुनिया खूबसूरत है।
यूं ही पढ़ सकते हैं तो,स्कूलों की क्या जरूरत है।
🙏🙏🙏🙏🙏
रचियता: फौजी तहलान जसौर खेड़ी।
मो० 8168845541,9017903739
स्वर: मिस्टर यश दलाल।
प्रेषक: प्रदीप सिंघल (जीन्द वाले)
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